नीति प्रीति परमारथ स्वारथु

चौपाई ३, दोहा २५४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥ बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥ ३ ॥

अर्थ

नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ रूप से कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, कर्म और काल।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण