भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु

दोहा २५८ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥ २५८ ॥

अर्थ

पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उस पर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ निकालकर वैसा ही (उसी के अनुसार) कीजिये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीवसिष्ठजी का भाषण” प्रकरण का दोहा २५८ है। इस प्रकरण में चित्रकूट की सभा में वसिष्ठजी द्वारा धर्म, मर्यादा और भरत-भक्ति पर दिए गए मार्गदर्शक वचनों का वर्णन है।

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श्रीवसिष्ठजी का भाषण