सो सकोच रसु अकथ सुबानी
सो सकोच रसु अकथ सुबानी
चौपाई २, दोहा ३१८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥ २ ॥
अर्थ
वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कवि की सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेम को स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजी को भेंटकर श्रीरघुनाथजी ने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजी को हृदय से लगा लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई