पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं

चौपाई १, दोहा ३१४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥ १ ॥

अर्थ

हे गोसाई! आपके प्रेम और सम्बन्ध से अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं। आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरण के दुःख) की ज्वाला में जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई