यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी

चौपाई ४, दोहा ३१४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥ भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥ ४ ॥

अर्थ

हे स्वामी! इस बड़े दोष को दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवक को शिक्षा दीजिये। दूध और जल को अलग-अलग करने में हंसिनी की-सी गतिवाली भरतजी की विनती सुनकर सब ने उसकी प्रशंसा की।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई