मुनिगन गुर धुर धीर जनक से
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से
चौपाई ४, दोहा ३१७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥ जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥ ४ ॥
अर्थ
मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरंधर जो अपने मनों को ज्ञानरूपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगत रूपी जल में कमल के पत्ते की तरह ही (जगत में रहते हुए भी जगत से अनासक्त) पैदा हुए।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई