तात तुम्हारि मोरि परिजन की

चौपाई १, दोहा ३१५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥ १ ॥

अर्थ

हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवार की, घर की और वन की सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजी को है। हमारे सिर पर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें सपने में भी क्लेश नहीं है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई