देसु कोसु परिजन परिवारू

चौपाई ४, दोहा ३१५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥ ४ ॥

अर्थ

देश, कोष, कुटुम्ब, परिवार आदि सब की जिम्मेदारी तो गुरुजी की चरण-रज पर है। तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियों की शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन (रक्षा)-भर करते रहना।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई