राजधरम सरबसु एतनोई

चौपाई १, दोहा ३१६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥ १ ॥

अर्थ

राजधर्म का सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मन में न संतोष हुआ, न शान्ति।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई