रामकृपाँ
रामकृपाँ
चौपाई २, दोहा ३१७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रामकृपाँ। अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥ भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरामजी की कृपा से। सारी उलझन सुधार दी। देवताओं की सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओं में भरकर भाई भरत से मिल रहे हैं। श्रीरामजी के प्रेम का वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई