भरत सील गुर सचिव समाजू
भरत सील गुर सचिव समाजू
चौपाई २, दोहा ३१६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥ २ ॥
अर्थ
इधर तो भरतजी का शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाज की उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेह के विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजी के प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदि का संकोच भी होता है।) आखिर [भरतजी के प्रेमवश] प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा कर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजी ने उन्हें आदरपूर्वक सिर पर धारण कर लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई