तन मन बचन उमग अनुरागा

चौपाई ३, दोहा ३१७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥ बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥ ३ ॥

अर्थ

तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा। धीरज की धुरी को धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजी ने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा दुःखी हो गयी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई