कुल कपाट कर कुसल करम के

चौपाई ४, दोहा ३१६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥ ४ ॥

अर्थ

रघुकुल [की रक्षा] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ) कर्म करने के लिये दो हाथ की भाँति (सहायक) हैं। और सेवा रूपी श्रेष्ठ धर्म के सुझाने के लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्ब के मिल जाने से परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजी के रहने से होता।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई