सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी

चौपाई १, दोहा ३१७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥ नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥ १ ॥

अर्थ

वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवध की आशा के समान ही वह जीवन के लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।

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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई