भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू
चौपाई १, दोहा ३१३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥ १ ॥
अर्थ
[अगले छठे दिन] सबेरे स्नान करके भरतजी, भूमिसुर और तेरहुति राजू तथा सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिये अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहने में सकुचा रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई