अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो
चौपाई ३, दोहा ३१४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो॥ आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥ ३ ॥
अर्थ
मुझे सब प्रकार से ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करने पर तिनके के बराबर (जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामी का स्नेह दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३१४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरतजी को पादुका प्रदान और भरतजी की भावपूर्ण विदाई का वर्णन है।
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राम द्वारा पादुका प्रदान, भरत की विदाई