प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता

चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥ ४ ॥

अर्थ

सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है)। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्र के समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बल का मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।

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नारद-राम संवाद