जद्यपि प्रभु के नाम अनेका

चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥ राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥ ४ ॥

अर्थ

यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और श्रुति कहती है कि वे एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियों के समूह के लिये यह वधिक के समान हो।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।

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नारद-राम संवाद