जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम

चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥ २ ॥

अर्थ

जो मनुष्य भ्रम को त्यागकर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले--हे राम, विज्ञान-विशारद! सुनिए--।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।

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नारद-राम संवाद