जनहि मोर बल निज बल ताही
जनहि मोर बल निज बल ताही
चौपाई ५, दोहा ४३ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥ यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥ ५ ॥
अर्थ
मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनों के लिये हैं। [भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेदारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेदारी मुझपर नहीं है। ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।
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नारद-राम संवाद