जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें
चौपाई ३, दोहा ४२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥ तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥ ३ ॥
अर्थ
मुझे भक्त के लिये कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले-मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ--।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
नारद-राम संवाद