जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ

चौपाई २, दोहा ४२ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी॥ २ ॥

अर्थ

[श्रीरामजी ने कहा--] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिवर! तुम नहीं माँग सकते?

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “नारद-राम संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवर्षि नारद और श्रीराम के बीच भक्ति, नाम-महिमा और दिव्य कृपा के गूढ़ संवाद का वर्णन है।

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नारद-राम संवाद