संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिए प्रेरणा
श्रीराम संतों के स्वभाव, विनय, दया और समत्व के लक्षण बताते हैं। साथ ही वे सत्संग और भजन को भवसागर से पार ले जाने वाला श्रेष्ठ साधन ठहराते हैं।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण १८ / १८
प्रकरण पाठ
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥ अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥ ४ ॥
अर्थ:
वे संत [काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर--इन] छः विकारों को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिंचन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी,।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥ सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती॥ १ ॥
अर्थ:
कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं, दूसरों के गुण सुनने से विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, नीति का कभी त्याग नहीं करते। सरल स्वभाव होते हैं और सभी से प्रेम रखते हैं।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥ श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥ २ ॥
अर्थ:
वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणों में निष्कपट प्रेम होता है।
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे। अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥ सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए। ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
अर्थ:
'शेष और शारदा भी नहीं कह सकते' यह सुनते ही नारदजी ने श्रीरामजी के चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे। भगवान् के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मपुर को चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल हरि के रंग में रँग गये हैं॥