भूधर नख बिटपायुध धारी

चौपाई २, दोहा ५३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥ २ ॥

अर्थ

पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर “श्रीरामचन्द्रजी की जय” पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जय की इच्छा कम न थी (अर्थात्‌ प्रबल थी)।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “माल्यवान का रावण को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में माल्यवान द्वारा रावण को संधि और विवेक का परामर्श देने तथा रावण के दुराग्रह का वर्णन है।

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माल्यवान का रावण को समझाना