नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा

चौपाई १, दोहा ५२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥ १ ॥

अर्थ

आकाश में [ऊँचे] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वी से जल की धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकार के पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर “मारो, काटो” की आवाज करने लगीं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “माल्यवान का रावण को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में माल्यवान द्वारा रावण को संधि और विवेक का परामर्श देने तथा रावण के दुराग्रह का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
माल्यवान का रावण को समझाना