जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि
दोहा ५१ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥ ५१ ॥
अर्थ
शिवजी और ब्रह्माजी तक बड़े-छोटे [सभी] जिन की अत्यन्त बलवान माया के वश में हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “माल्यवान का रावण को समझाना” प्रकरण का दोहा ५१ है। इस प्रकरण में माल्यवान द्वारा रावण को संधि और विवेक का परामर्श देने तथा रावण के दुराग्रह का वर्णन है।
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माल्यवान का रावण को समझाना