जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा
चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥ ४ ॥
अर्थ
रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सब को युद्ध की इच्छा भूल गयी। रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राण ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सब जाता न रहा हो)।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “माल्यवान का रावण को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में माल्यवान द्वारा रावण को संधि और विवेक का परामर्श देने तथा रावण के दुराग्रह का वर्णन है।
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माल्यवान का रावण को समझाना