श्रीरामजी से हनुमानजी का मिलना और श्रीराम-सुग्रीव की मित्रता
हनुमानजी पहली बार श्रीरामजी और लक्ष्मणजी से मिलकर उनका परिचय सुग्रीव से कराते हैं। अग्नि को साक्षी मानकर श्रीरामजी और सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होती है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण २ / १४
प्रकरण पाठ
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना॥ धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई॥ २ ॥
अर्थ:
सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले-हे हनुमान्! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। अपने हृदय में उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारे से समझाकर कह देना।
पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला॥ बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
यदि वे बालि के भेजे हुए हों तो मैं मन से मैला हो जाऊँगा; मैं तुरन्त ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँगा। [यह सुनकर] हनुमानजी ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गये और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे--।
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥ मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर धीरज धरकर स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है। [फिर हनुमानजी ने कहा--] हे स्वामी! मैंने जो पूछा, वह मेरा पूछना तो न्याय था, [वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी-बुद्धि थी, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थितिके अनुसार मैंने आपसे पूछा] परन्तु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं?।
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥ तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर हनुमानजी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना तन प्रकट कर दिया; उनके हृदय में प्रेम छा गया। तब रघुपति ने उठाकर उन्हें हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया।
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
सुनो कपि! मन में ग्लानि मत मानना। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहता है (मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय), पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता)।
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ:
हमें देखकर उन्होंने 'राम! राम! हा राम!' पुकारकर वस्त्र डाल दिया था। श्रीरामजी ने उसे माँगा, तब सुग्रीव ने तुरंत ही दे दिया। वस्त्र को हृदय से लगाकर श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत सोच किया।