कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा

चौपाई १, दोहा ५ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा। लछिमन राम चरित सब भाषा॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी॥ १ ॥

अर्थ

दोनों ने [हृदय से] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा। तब लक्ष्मणजी ने श्रीरामचन्द्रजी का सारा चरित कहा। सुग्रीव ने नेत्रों में जल भरकर कहा—हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायँगी।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।

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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता