सुग्रीव का दुःख सुनाना, बालि वध की प्रतिज्ञा, श्रीरामजी का मित्र लक्षण वर्णन

सुग्रीव अपने अपमान, भय और वियोग की कथा श्रीरामजी को सुनाता है। प्रभु बालि वध का आश्वासन देते हैं और सच्चे मित्र के लक्षणों का गहन उपदेश करते हैं।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ३ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥ मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं। हम दोनों में ऐसी प्रीति रही कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हे प्रभो! मय दानव का एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। वह हमारे गाँव में आया।

चौपाई

अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहइ न पारा॥ धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा॥ २ ॥

अर्थ:

उसने आधी रात को नगर के द्वार पर आकर पुकारा (ललकारा)। बालि शत्रु के बल को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर वह भागा। मैं भी फिर भाई के साथ लग गया।

चौपाई

गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई॥ परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह मायावी एक पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने मुझे समझाकर कहा—तुम एक पखवाड़े (पंद्रह दिन) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं तब न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया।

चौपाई

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥ बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे खरारि! मैं वहाँ महीना-दिन तक रहा। वहाँ (उस गुफा से) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। तब [मैंने समझा कि] उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिए मैं वहाँ (गुफा के द्वार पर) शिला दे कर भाग आया।

चौपाई

मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं॥ बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥ ५ ॥

अर्थ:

मन्त्रियों ने नगर को बिना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको जबरदस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे देखकर उसने हृदय में भेद बढ़ाया (बहुत ही विरोध माना)।

चौपाई

रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी॥ ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥ ६ ॥

अर्थ:

उसने मुझे शत्रु के समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्री भी छीन ली। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भय से समस्त भुवनों में बेहाल होकर फिरता रहा।

चौपाई

इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥ सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥ ७ ॥

अर्थ:

वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। सेवक का दुःख सुनकर दीनदयाला श्रीरामजी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं।

दोहा

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥ ६ ॥

अर्थ:

हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे।

दोहा 7 के अंतर्गत
चौपाई

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥ १ ॥

अर्थ:

जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने।

चौपाई

जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥ २ ॥

अर्थ:

जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे।

चौपाई

देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥ ३ ॥

अर्थ:

देने-लेने में मन में शंका न रखे। बल के अनुमान से सदा हित ही करे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। श्रुति कहती है कि संत मित्र के गुण ये हैं।

चौपाई

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥ जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है—हे भाई! [इस तरह] जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है।

चौपाई

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥ सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥ ५ ॥

अर्थ:

मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र—ये चारों शूल के समान [पीड़ा देनेवाले] हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा)।

चौपाई

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥ ६ ॥

अर्थ:

सुग्रीव ने कहा—हे रघुवीर! सुनिए, बालि महान् बलवान् और अत्यन्त रणधीर है। फिर सुग्रीव ने श्रीरामजी को दुन्दुभि राक्षस की हड्डियाँ और ताल के वृक्ष दिखलाये। श्रीरघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के (आसानी से) ढहा दिया।

चौपाई

देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥ बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा॥ ७ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचानकर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे।