को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा
चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा॥ कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥ ४ ॥
अर्थ
हे वीर! साँवले और गोरे शरीरवाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलनेवाले आप किस कारण बन में विचर रहे हैं?।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता