ता पर मैं रघुबीर दोहाई
ता पर मैं रघुबीर दोहाई
चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥ सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥ २ ॥
अर्थ
उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई करके कहता हूँ कि मैं भजन-उपाय कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण करना ही पड़ता है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता