देखि पवनसुत पति अनुकूला
देखि पवनसुत पति अनुकूला
चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥ नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥ १ ॥
अर्थ
स्वामी को अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवनकुमार हनुमान्जी के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। [उन्होंने कहा--] हे नाथ! इस पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहता है, वह आपका दास है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता