पठए बालि होहिं मन मैला

चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला॥ बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥ ३ ॥

अर्थ

यदि वे बालि के भेजे हुए हों तो मैं मन से मैला हो जाऊँगा; मैं तुरन्त ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँगा। [यह सुनकर] हनुमानजी ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गये और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे--।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।

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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता