अस कहि परेउ चरन अकुलाई
अस कहि परेउ चरन अकुलाई
चौपाई ३, दोहा ३ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥ तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥ ३ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर हनुमानजी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना तन प्रकट कर दिया; उनके हृदय में प्रेम छा गया। तब रघुपति ने उठाकर उन्हें हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता