जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें
चौपाई १, दोहा ३ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥ नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥ १ ॥
अर्थ
हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक प्रभु को भूले नहीं। हे नाथ! जीव आपकी माया से मोहित है। वह आप ही की कृपा से निस्तार पा सकता है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता