मंगलाचरण
किष्किंधाकांड का आरंभ मंगलमय वंदना से होता है, जिसमें प्रभु और पवित्र परंपरा का स्मरण किया जाता है। यह आरंभ आगे की कथा के लिए शुभ और भक्तिभावपूर्ण वातावरण निर्मित करता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण १ / १४
प्रकरण पाठ
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः॥ १ ॥
अर्थ:
कुन्दपुष्प और नील कमलके समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान, विज्ञानके धाम, शोभासम्पन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदोंके द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मणोंके समूहके प्रिय [अथवा प्रेमी], मायासे मनुष्यरूप धारण किये हुए, श्रेष्ठ धर्मके लिये कवचस्वरूप, सबके हितकारी, श्रीसीताजीकी खोजमें लगे हुए, पथिकरूप रघुकुलके श्रेष्ठ श्रीरामजी और श्रीलक्ष्मणजी दोनों भाई निश्चय ही हमें भक्तिप्रद हों।
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्॥ २ ॥
अर्थ:
वे सुकृती (पुण्यात्मा पुरुष) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [के मंथन] से उत्पन्न हुए कलियुग के मल को सर्वथा नष्ट कर देनेवाले, अविनाशी, भगवान् श्रीशम्भु के सुन्दर एवं श्रेष्ठ मुखरूपी चन्द्रमा में सदा शोभायमान, जन्म-मरणरूपी रोग के औषध, सबको सुख देनेवाले और श्रीजानकीजी के जीवनस्वरूप श्रीरामनामरूपी अमृत का निरन्तर पान करते रहते हैं।