प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना

चौपाई ३, दोहा २ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥ पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना॥ ३ ॥

अर्थ

प्रभु को पहचानकर हनुमानजी उनके चरण पकड़कर गिर पड़े। वह सुख, हे उमा! जाकर नहीं बरना जा सकता। पुलकित शरीर, मुख से वचन नहीं निकलता। वे प्रभु के रुचिर वेष की रचना देख रहे हैं!

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।

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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता