तेहि सन नाथ मयत्री कीजे

चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे॥ सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥ २ ॥

अर्थ

हे नाथ! उससे मित्रता कीजिए और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिए। वह सीताजी की खोज कराएगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरों को भेजेगा।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।

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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता