पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही
चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥ मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥ ४ ॥
अर्थ
फिर धीरज धरकर स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है। [फिर हनुमानजी ने कहा--] हे स्वामी! मैंने जो पूछा, वह मेरा पूछना तो न्याय था, [वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी-बुद्धि थी, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थितिके अनुसार मैंने आपसे पूछा] परन्तु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं?।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।
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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता