सो अनन्य जाकें असि मति न

दोहा ३ · किष्किन्धाकाण्ड

दोहा पाठ

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ ३ ॥

अर्थ

और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता” प्रकरण का दोहा ३ है। इस प्रकरण में हनुमानजी और श्रीराम के मिलन तथा अग्नि को साक्षी मानकर राम-सुग्रीव की पवित्र मित्रता स्थापित होने का वर्णन है।

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हनुमानजी-राम मिलन और राम-सुग्रीव मित्रता