खल परिहास होइ हित मोरा
खल परिहास होइ हित मोरा
चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥ हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥ १ ॥
अर्थ
किन्तु दुष्टों के परिहास से मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठवाली कोयल को कौए कठोर ही कहा करते हैं। जैसे बगुले, मेढक, चातकही को हँसते हैं, वैसे ही मलिन खल निर्मल बतकही को हँसते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।
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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता