तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा

चौपाई ५, दोहा १३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥ मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥ ५ ॥

अर्थ

उसी बल से (महिमा का यथार्थ वर्णन नहीं, परन्तु महान् फल देनेवाला भजन समझकर भगवत्कृपा के बल पर ही) मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा कहूँगा। इसी विचार से [वाल्मीकि, व्यास आदि] मुनियों ने पहले हरि की कीर्ति गायी है, भाई! उसी मार्ग पर चलना मेरे लिये सुगम होगा।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।

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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता