जदपि कबित रस एकउ नाहीं

चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥ सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥ ४ ॥

अर्थ

यद्यपि मेरी इस रचना में कविताका एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है। भले संग से, किसने बड़प्पन नहीं पाया ?।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।

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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता