कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना

चौपाई ४, दोहा ११ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥ हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥ ४ ॥

अर्थ

संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वतीजी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [कि मैं क्यों इसके बुलाने पर आयी]। बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धि को सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।

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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता