जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं

चौपाई ६, दोहा १२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥ समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥ ६ ॥

अर्थ

जिस हवा से सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनती में है। श्रीरामजी की असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है--।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।

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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता