समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी
चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥ एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥ ४ ॥
अर्थ
मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथाको सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।
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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता