जौं बरषइ बर बारि बिचारू
जौं बरषइ बर बारि बिचारू
चौपाई ५, दोहा ११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू॥ ५ ॥
अर्थ
इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणि के समान सुन्दर कविता होती है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।
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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता