राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ
चौपाई ३, दोहा ११ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥ कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥ ३ ॥
अर्थ
सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरितरूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचारकर कलियुग के पापों को हरनेवाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।
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तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता