मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ
छन्द, दोहा १० के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥ प्रभुसुजस संगति भनिति भलिहोइहि सुजन मन भावनी। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
अर्थ
तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करनेवाली और कलियुग के पापों को हरनेवाली है। मेरी इस भद्दी कवितारूपी नदी की चाल पवित्र जलवाली नदी (गंगाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है। प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुन्दर यश के संग से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को भानेवाली हो जायगी। श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करनेवाली होती है॥।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “तुलसीदास की दीनता और भक्तिकविता” प्रकरण का छन्द, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदासजी की दीनता, प्रभु-कृपा पर निर्भरता और रामभक्तिमयी कविता की पवित्र महिमा का वर्णन है।